रेमिटेंट या स्वल्पविराम ज्वर

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यह पहले अकसर कन्टिन्यूड अर्थात एक ज्वर के लक्षण के साथ ही होता है. इसके बाद दूसरे-दूसरे ऐसे लक्षण प्रकट होते है, जिससे प्रभेद समझ में आता है. इसको पैत्तिक (बिलियस), एकज्वर (कन्टिन्यूव्ड), मैलेरियल रेमिटेंट प्रभुति कितने ही नामो से पुकारा जाता है. यह ज्वर आरोग्य होने के समय कभी-कभी-इंटरमिटेंट (सविराम ज्वर) का आकार धारण करता है.

रेमिटेंट ज्वर के लक्षण

  • वमन
  • मिचली
  • भूख न लगना
  • समूचे देह में दर्द होना
  • सर दर्द और सर चकराना
  • आँख मुँह लाल और बेचैनी होना
  • नींद न आना और हल्का प्रलाप।

वमन में – खाये हुए पदार्थ, जलीय पदार्थ और पित्त, जीभ सुखी और मैल भरी, ओठ फटे, तेज़ प्यास प्रभुति लक्षण रहते है. सविराम ज्वर (intermittent fiver) जिस तरह एकदम उतर जाता है यह उस तरह नहीं उतरता। सवेरे २-१ डिग्री काम होने के कुछ ही देर बाद, उसी ज्वर के ऊपर फिर ज्वर आ जाता है. ज्वर घटने की अवस्था में निचे १०२ डिग्री तक उतरता है और ऊपर १०५-१०६ डिग्री तक चढ़ता है. अधिकांश स्थानों में ज्वर सवेरे घटता है, इसके बाद दोपहर के समय ज्यादा बढ़ जाता है और आधी रात के बाद से क्रमशः घटना आरम्भ होता हैं अथवा आधी रात के बाद से ताप बढ़ने लगता है और सवेरे थोड़ा सा कुछ घटता है. प्रबल और कठिन प्रकार के ज्वर में दिन के दोपहर के समय और आधी रात के समय, दो बार ज्वर का आक्रमण होता है अथार्त ताप तथा उपसर्गो की व्रद्धि होती है.

रेमिटेंट ज्वर का भोगकाल प्रायः १४-१५ दिन है. हल्का ज्वर रहने पर ५-६ दिनों में छूट जाता है. उपसर्ग मिले ज्वर में ४ से ५-६ सप्ताह का समय लग है. रेमिटेंट ज्वर-कभी-कभी सवेरे की विरामावस्था (ज्वर घटनेवाली अवस्था) बहुत देरतक स्थाई होकर-सविराम -(inter -mittent) ज्वर आकार धारण करती है. इसके अलावा कभी-कभी कुछ अधिक दिनों तक ज्वर भोगने के कारण रोगी कमजोर और टाइफाइड मियादी सन्नी-पतिक अवस्था में जा पड़ता है. इस समय यदि उपसर्गो के कारण मृत्यु होती है तो तीसरे सप्ताह के मध्य में मृत्यु होती है. हमेशा निचे लिखे उपसर्गो के द्वारा ही मृत्यु हुआ करती है.

  • मस्तिष्कवरण-प्रदाह (मेनिंजाइटिस)
  • फुसफुस-प्रदाह (निमोनिया)
  • पाकाशय-प्रदाह
  • यकृत और प्लियाह का प्रदाह
  • एकाएक ज्वर बहुत बढ़कर बाद में एकाएक उतर जाना।

ये उपसर्ग मूल रोगी की अपेक्षा भी ज्यादा भयानक है. इनके लक्षण, इनके अध्यायों में मिलेंगे और वहाँ बताये अनुसार ही औसध और पथ्य आदि की व्यव्यस्था करनी होगी।

रेमिटेंट-ज्वर पथ्य

औसध यह पहली अवस्था में प्रायः एक-ज्वर अथार्त कन्टिन्यूएड फीवर के लक्षण साथ ही पैदा होता है. इसलिए पहले ऐकोनाइट, ब्रायोनिया प्रभुति जो सब दवाएं उसके अध्याय में लिखी है, उनका ही प्रयोग करना होगा। यदि इन दवाओं के वयवहार के बाद ज्वर-सविराम आकार धारण करे, तो सविराम ज्वर की जो दवाएं बताई गई है, वे ही देनी होगी, परन्तु लक्षण के अनुसार। रेमिटेंट कभी-कभी टाइफाइड का आकार धारण करता है.

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