एक ज्वर और इसका उपचार

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Thermometer

हमारे देश में सबसे ज्यादा जो ज्वर देखने में आता है उनमे से कुछ का आज हम इस लेख में निचे विवरण करने जा रहे है, हमें पूरी उम्मीद है की आपको हमारी यह लेख काफी फायदेमंद होगी।

एक ज्वर

इस ज्वर का कोई विशेष कारन नहीं रहता है, यह ज्वर बहुत ही हलके ढंग का होता है और थोड़ा ही देर तक ठहरता है, इसमें कोई विशेष डर की बात भी नहीं रहती और अक्सर प्राणघातक नहीं होता है. सर्दी लग जाना, उत्पात, बहुत ज्यादा खाना – पीना, अधिक परिश्रम, मन का उद्वेग प्रभुति कारणों से ही प्राय यह बुखार आया करता है और ज्यादातर बच्चोको ही यह बीमारी हुआ करती है. अंग्रेजी में जिसे फेब्रीक्युलस, साइनोकैल, गैस्ट्रिक बिलियस फीवर कहते हैं. ये सभी उक्त एक ज्वर के ही अंतर्गत आते है.

एक ज्वर का लक्षण

शीत या कम्प, समूचे शरीर में दर्द, सर दर्द, वमन प्रभुति कितने ही लक्षण के साथ पहले यह ज्वर होता है, इसकेबाद एकाएक ताप बढ़ जाता है, सर में तेज दर्द, प्रबल प्यास, मिचली, प्रबल वमन, भूख न लगना, बेचैनी, धीमा प्रलाप, शरीर की त्वचाका सूखापन प्रभुति लक्षण प्रकट होते हैं. नाड़ी की गति तेज, पूर्ण और वेगवती रहती हैं, जीभ पर मैल चढ़ी रहती है, ताप १०२ से १०४ डिग्री तक चढ़ता है, इस तरह ताप कई घंटे या कई दिनों तक एक भाव से रहने के बाद घटकर प्राय ५ से ६ दिनों में ज्वर छूट जाता है और १० दिनों से अधिक प्राय स्थाई नहीं रहता है.

एक ज्वर का पथ्य

ज्वर रहने के समय दूध, साबू , बार्ली, आरारूट, धान का लावा, बताशा, मिसरी, बिस्कुट, भुना हुआ चुरा, अनार, बिदाना, थोड़े मीठे फल प्रभुति और ज्वर छूट जाने पर दो एक दिन बाद रोटी, भात, तरकारी (सब्जी) इत्यादि दिए जा सकते है.

औसध

प्रधान औसध :- एकोनाइट, ब्रायोनिया, बेलेडोना, फेरम फॉस, रस टक्स, जेलसिमियम, वेरेट्रम विरिड, इपिकाक, नक्स, पल्सेटिला, मकुरिर्यास, बैप्टिसिया, कोलोसिन्थ, आइरिस वार्स, एनीटम टार्ट, कैमोमिला प्रभिति।

एकोनाइट: यह बीमारी की पहली अवस्था में फायदा करता है. बहुत प्यास, उद्देग, बेचैनी, शरीर में जलन, लगातार इधर से उधर करवट बदलना और छटपटाना, रोगी कहता है की मै अब न आऊंगा (मृत्यु का भय), कलेजे में दर्द, थोड़ा पेशाब प्रभुति लक्षणों में इसका प्रयोग होता है. इसमें नाड़ी कड़ी और मोटी रहती है और उसकी चल तेज रहती है. रोगी चिरचिरा रहता है, लड़ाई-झगड़ा पसंद करता है.

ब्रायोनिया: रोगी चुपचाप पड़ा रहता है, शरीर में दर्द रहता है, दवा देनेपर दर्द घटता है, आँखे, कनपटी तथा सरमे बहुत दर्द रहता है, यह दर्द हिलने-दोलनेपर बढ़ता है, आँख खोलने पर भी सरका दर्द बढ़ जाता है, इसलिए रोगी चुपचाप पड़ा रहता है. उठकर बैठने या सर उठानेपर सरमे चक्कर आ जाता है, जी मिचलाता है, मुँह स्वाद तीता रहता है, जीभ पिली लेप चढ़ी रहती है और कभी कभी बहुत ज्यादा प्यास भी लगता है. पित्त का होना, पानी पीते ही वमन होता है, कब्जियत, जरा लगना, मुँह में बदबू, ओठ फटे इत्यादि इसके विशेष लक्षण हैं.

बेलेडोना: रोगी का बुखार तेज रहता है, शरीर भी खूब गरम रहता है, ज्वर के साथ पसीना भी होता है, शरीर का जो अंग दबा रहता है या दबाकर रोगी सोता है उसी अंश में अधिक पसीना होता है, बहुत ज्यादा पसीना होनेपर भी बुखार में कोई कमी नहीं होती, सर में तेज़ दर्द और यंत्रणा, आँखे लाल, रोगी विकार की भाती भूल बकता है, भुत या किसी काल्पनिक जन्तु को देखकर डरता है, चौककर उठता है. इसके आलावा जीभ पर मोटा पीला लेप, मुँह का स्वाद खट्टा, अम्ल, पित्त या लार तरह लसदार वमन, प्यास, एक बार शीत, एक बार उत्ताप, गाल गलेकि गाँठ फूलना और उसमे दर्द, घूट लेनेपर तकलीफ प्रभूति कितने ही लक्षणों में भी इसका प्रयोग होता है.

फेरम फॉस: एकोनाइट की तरह ज्वर और प्रदाह की पहली अवस्था में तथा एकोनाइट और जेल्सीमिमियम के बिच के लक्षण में इसका व्यवहार होता है.

रस टक्स: सर्दी लगकर या पानी में भींगकर रोग पैदा होना, सारी देहमे दर्द, यह दर्द खासकर कमरमें ज्यादा होता है. रस टक्स में एकोनाइट और आर्सोनिक की तरह छटपटी रहती है, परन्तु यह साधारणतः शरीर में दर्द रहने कीही कारण, रस टकस्का दर्द – हिलने-डोलने, इधर-उधर करने पर कुछ घटता है, इसलिए रोगी करवट बदलता रहता है या छटपटया करता है. इसका दर्द या ऐठन टाटने की तरह होता है. ज्वर के साथ खासी और प्यास रहती है.

ईयूपेटोरियम पर्फ़ो: शरीर में हड्डी-तोड़ दर्द, जोरोका सर-दर्द, कमर दर्द, ऐठन की तरह दर्द, पित्त का वमन – ये ही कई इसके सबसे प्रधान लक्षण है. जाड़ा लगना, कपकपी, बदनमे जलन या प्यार्यायक्रम से सहित और ताप, जीभ मोती पिली मैल से ढकी, यकृति की जगह पर दर्द, पेशाब थोड़ा, पित्त के दस्त प्रभूति भी इसकेआनु सदिक्घ लक्षण है.

जेलसिमियम: साधरणतः बच्चे और बालको के लिए और मच्छरा-वायु (हिस्ट्रिया) वाली स्त्रिया आदि श्रन्याविक धातु वाले व्युक्तिओ के ज्वर ही यह ज्यादा फायदा करता है. किसी भी ज्वर की पहली अवस्था में शरीर में दर्द, तमतमाया हुआ लाल रंगका चेहरा, छलछलाई जलभरी आँखे, आच्छन्न भाव, थोड़ा हल्का अतिसार या कब्जियत, छींक, नाक से कच्चे पानी निकलना, सर्दी, रातमे ज्वर बढ़ जाना और सवेरे पसीना हुए बिना ही ज्वर का घाट जाना, भूख न लगे, मुँहका, स्वाद तीता प्रभूति लक्षण रहे तो – इसका व्यवहार होता है. इसमें रोगी बहुत ही सुस्त हो जाता है और सिर्फ सोना चाहता है, यदि कोई शरीरपर हाथ लगाता है, बात कहता है या पास जाता है तो बेतरह चिढ़ उठता है. जेलसिमियम के रोगी का पैर ठंडा और माथा गरम रहता है, प्यास प्राय ही नहीं रहती। यह सविराम, अविराम, रेमिटेंट, एक-ज्वर, प्लीहा और यकृति सयुंक्त ज्वर प्रभूति इस तरह के ज्वर ही उपयोग है.

वेरेट्रम विरिड: ज्वर ताप बहुत ऊँचा चढ़ा रहता है, यहाँ तक कि १०५, १०६ डिग्री इसके साथ ही किसी यंत्र में कॉनजेसन (रक्तकी अधिकता) और गर्दन के पिछले भाग में और कंधे में दर्द हो, शरीर कांपता हो, आँखे घूमती हों, सर हिलता हो, वमन, एकाएक अकरण, कष्टकर हिचकी, नाड़ी की गति तेज और मृदु हो, मुँह और ओठ सूखते हो तो इसका प्रयोग करना चाहिए। २-३ मात्राओ से अधिक इसका प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। क्यूंकि ज्यादे मात्राओं के प्रयोग से हरनपिंडकी क्रिया में गरबरी हो जाती है.

इपिकाक: यह सर्दी-ज्वर, रेमिटेंट (स्वल्प विराम), इंटरमिटेंट (सविराम) तथा पाकाशय की गरबरी के कारण पैदा हुए ज्वर में ज्यादा फयदा करता हैं. किसी भी ज्वर में वमन, मिचली, मुँह में बदबू, पेट में शुलकी तरह दर्द, प्यास, कपकपी, पिले या हरे रंग का दस्त आते है तो इसके प्रयोग से ज्यादा फायदा होता है. इपिकाक की जीभ प्राय साफ रहती है. शर्दी के ज्वर में नाक में गाढ़ी शर्दी भरी रहती है, पर जोर से नाक छिरके बिना नहीं निकलती, नाकसे खून गिरता है. ज्वर के साथ ख़ासी, गला सायं सायं करना, साँस में शब्द प्रभूति लक्षण रहने पर पहले इसका ही प्रयोग करना चाहिए।

नक्स विमिका: शीत और ताप या तो प्रयायक्रम से होता है या केवल सिरावन ही लगा करता है. शरीर में असहा ऐठन का दर्द, सवेरे रोग-लक्षणों की वृद्धि हो जाती है, इसके अलावा – सीने और गले में जलन, मुँह में तीती डकार, अर्जीण अवस्था में खाये हुए पदार्थ का वमन। तीता या खट्टा वमन, पाकस्थली, यकृति और प्लीहाकि जगह पर दर्द, नाभि की जड़ में गड़बड़ आवाज और शुलकी तरह दर्द, कब्जियत, लगातार पाखाना लगना और थोड़ा-थोड़ा-सा पाखाना होना। सर में चक्कर, कपाल में दर्द, जीभपर सफ़ेद या पिली मेल, छीके, नक् सात जाना प्रभूति लक्षणवाले कई ज्वरो में साधारणतः इसका व्यवहार होता है.

पल्सेटिला: ज्वर-तीसरे पहर या संध्या के चार-पांच बजे बढ़ता है. ज्वर के साथ साथ ही आँख और हाथ पैरो में जलन होती है. रोगी खुली हवा में रहना चाहता है. प्यास नहीं रहती है. इसके अलावा – मुँह में पानी भर आना, चर्बी मिले खाने वाला पदार्थ खाने की इच्छा न होना, खट्टी चीजें खाने की अधिक इच्छा, मिचली, तीता या खट्टा वमन, अर्जीण खायी हुई चीजों का वमन, कब्जियत या पित्त के दस्त प्रभूति कितने ही लक्षणों में इसका व्यवहार होता है. इसमें जीभपर सफ़ेद रंग की मैल चढ़ी रहती है.

मकुरिर्यास: ज्वर के साथ बहुत ज्यादा पसीना होता है, पर इससे भी ज्वर बिलकुल नहीं घटता, बल्कि बीमारी बढ़ती ही दिखाई देती है. यही एक इसका विशेष लक्षण है. अगर बेलेडोना के बाद इसका व्यवहार होता है, तो इससे ज्यादा फायदा होता है. किसी स्थान की ग्रंथि (ग्लैंड) प्रदाहित होकर ज्वर, छींक, नाक से पानी की तरह नयी शर्दी निकलने के साथ ज्वर हो. ज्वर के साथ साथ शीत शीत भाव तथा अन्यान्य उपसर्गोंकी वृद्धि हो, प्यार्याक्रम से जारा और ताप। प्लीहा और यकृति की जगह पर दर्द और नाभि के चारो ओर दर्द हो, जीभ सरस, सफ़ेद या पिले रंग की मैल से ढ़की प्रभूति कई इसके विशेष लक्षण है.

बैप्टिसिया: इसका टाइफाइड और इन्फ्लूएंजा की बुखार में ही अधिक व्यवहार होता है. हमेशा ही बुखार चढ़ा रहता है, ज्वर सवेरे काम, लेकिन तीसरे पहर ज्यादा चढ़ जाता है, समूचे शरीर में दर्द, जरा मालूम होना, नाड़ी-पूर्ण, कोमल और तेज़, ताप अधिक, ताप की वजह से ही रात में नींद नहीं आता है. सर में दर्द, प्रलाप सुचना, पयर्क्रम से कब्ज और दस्त, कब्ज, बदबूदार दस्त, भूख न लगना, बहुत प्यास, जीभ के निचे का भाग थोड़ा सा पीला और किनारा लाल रंग का प्रभुति लक्षणों में इसका व्यवहार होता है.

कोलोसिन्थ: पैत्तिक ज्वर, इसके साथ ही पेट में एक प्रकार का शूल का दर्द। दबाने पर घटना, अतिसार, ऑव मिला मल, पेटमे दर्द, कुछ खाने से ही दर्द का बढ़ जाना, पैर की पोटली में मरोड़ा का दर्द इत्यादि।

आइरिस वार्स: शरीर अच्छी तरह ढँक लेनेपर भी जाड़ा मालूम होना, इसके साथ ही पित्त के दस्त, खट्टा या तीता वमन, पेटसे लेकर गले तक जलन.

ऐन्टिम टार्ट: बसंत या वर्षा ऋतू का ज्वर, सर्दी, खांसी के साथ ज्वर। रोगी खाँसता है, गला घड़घड़ाया करता है, पर कुछ निकलता नहीं, केवल ओकाई आती है. कब्ज, रोगी मानो आसन्न दुर्बल हो, सिर्फ सोना चाहता है. औघया-सा पड़ा रहता है, प्यास नहीं रहती। बच्चा माता की गोद से उतरना नहीं चाहता, शरीर पर कोई हाथ लगाता है तो रोता है.

कैमोमिला: रोगी बहुत ही क्रोधित और चिड़चिड़ा। बच्चा केवल टे टे किया करता है, रोता हैं, मानो क्रोध से भड़ा हो, अगर हाथ में कोई चीज दी जाती है तो तोड़कर फेक देता है, गोद में लेने पर कुछ शांत रहता है.

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